सोचा कुछ तुमपर लिखूँ।

सोचा कुछ तुमपर लिखूँ।
पर विषय क्या हो, भाव क्या हो!
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो!

प्रेम पर लिखूंगी तो हँसोगे तुम।
मेरी बहुत खिंचाई करोगे तुम।
बोलोगे बचपना है।
तुम्हें परिपक्व लगे जो प्रेम, उसका प्रस्ताव क्या हो!
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो!

दोस्ती पर लिखूँ तो सुन लोगे।
मुस्कुरा कर चल दोगे।
बोलोगे ऐसा कुछ पहले भी सुना है।
तुम्हें अनसुनी लगे जो दोस्ती, उसमें लगाव क्या हो!
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो!

लिखूँ आदतों पर तुम्हारी,
तो बिना सुने ही पंक्तियां सारी।
तुम बोलोगे अब और नहीं बस।
तुम सुनते ही रहना चाहो जो, उन बातों का बर्ताव क्या हो।
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो।

और अगर लिख दूँ झगड़ों पर,
मैं जीत चुकी जो, उन बहसों पर,
फिर तो चेहरा लाल कर लोगे।
तुम जीत हासिल कर सको जहाँ, हमारे बीच वो टकराव क्या हो।
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो।

लिखूँ अगर तुम्हारे गुणों पर।
कम है ये... बोलोगे गिनकर।
अपनी तारीफ में लग जाओगे।
तुम्हें पूरी लगे प्रशंशा, उन विशेषणों का चुनाव क्या हो।
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो।

लिखने का हुनर है मगर,
दुविधा में पड़े कलम अगर।
तो कैसे कुछ तुमपर लिखूँ।
कविता कैसे पूरी करूँ।
अधूरी पंक्तियों को रच सकें जो, उन कवियों का स्वभाव क्या हो।
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो।

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