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Showing posts from May, 2018

Time Tells

The love of now isn't the love of then.
My arms heavier, your cheeks chubbier.
My lenses thick, you walk with stick.
My hair dyed, your teeth prescribed.
My hands trembling, your lips quivering.
And love... Struggling.
To be now, like it was then.
Too old we are...for restoration.

सोचा कुछ तुमपर लिखूँ।

सोचा कुछ तुमपर लिखूँ।
पर विषय क्या हो, भाव क्या हो!
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो!

प्रेम पर लिखूंगी तो हँसोगे तुम।
मेरी बहुत खिंचाई करोगे तुम।
बोलोगे बचपना है।
तुम्हें परिपक्व लगे जो प्रेम, उसका प्रस्ताव क्या हो!
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो!

दोस्ती पर लिखूँ तो सुन लोगे।
मुस्कुरा कर चल दोगे।
बोलोगे ऐसा कुछ पहले भी सुना है।
तुम्हें अनसुनी लगे जो दोस्ती, उसमें लगाव क्या हो!
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो!

लिखूँ आदतों पर तुम्हारी,
तो बिना सुने ही पंक्तियां सारी।
तुम बोलोगे अब और नहीं बस।
तुम सुनते ही रहना चाहो जो, उन बातों का बर्ताव क्या हो।
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो।

और अगर लिख दूँ झगड़ों पर,
मैं जीत चुकी जो, उन बहसों पर,
फिर तो चेहरा लाल कर लोगे।
तुम जीत हासिल कर सको जहाँ, हमारे बीच वो टकराव क्या हो।
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का बहाव क्या हो।

लिखूँ अगर तुम्हारे गुणों पर।
कम है ये... बोलोगे गिनकर।
अपनी तारीफ में लग जाओगे।
तुम्हें पूरी लगे प्रशंशा, उन विशेषणों का चुनाव क्या हो।
तुम्हें पसंद आये जो, वो शब्दों का …

अंतर

मैं समंदर का साहस,
तुम किनारे की कायरता।
संग तो, सहज ना होगा।

मैं आग की लाल लपट,
तुम धुएं का कालापन।
रंग निःसंदेह, अलग ही होगा।

मैं पेड़ की ऊंची डाल,
तुम सूखे पत्तों की टहनी।
कद एक रहे, संभव न होगा।

ना मेरे मन में अब कोई चाह,
ना तुम्हारे मन में प्रेम प्रवाह।
अलगाव कुछ गलत ना होगा।

प्रेम ही है या प्रेम सा कुछ और है ये?

तुम उस तूफान से बड़े हो,
उस दरिया से भी गहरे हो।
सौ साल पुराने उस बरगद के पेड़ से भी विशाल,
एक-एक डाल विकराल।

सुना था प्रेम प्रवीण होता है,
मधुर, कोमल, सुंदर, शालीन होता है।
फिर मेरा वाला इतना कठोर कैसे,
प्रेम ही है या प्रेम सा कुछ और है ये?

यहां ना चाँद से मेरी बराबरी की जाती है,
ना तारे तोड़ लाने की बात कही जाती है।
गीतों और कविताओं में कहां संवाद होते हैं।
कहां पलकों के उठने-गिरने पर लोग बर्बाद होते हैं।

यहां वही समावेश है जो संभव है।
चल पडूँ मैं कल्पनाओं की ओर कैसे?
प्रेम ही है या प्रेम सा कुछ और है ये?

दूर है तो दर्द है, पास है तो प्यास है।
हाँ, सभी धागों में ये धागा थोड़ा खास है,
लेकिन ये आभास है,
कि धूप की कोमल किरण नहीं, ये प्रचंड प्रकाश है।

यहां वहीं छाव है जहां ताप है।
इस जलन में जी सकूंगी जीवन कैसे?
प्रेम ही है या प्रेम सा कुछ और है ये?

स्वीकार अगर ना भी करूं इस परिवेश को,
भेज दूँ प्रेमी को संबंध-विच्छेद संदेश तो,
तो भी क्या मन विकल ना होगा,
ये विषम बोझ बोझल ना होगा।

यहां वहीं सुख है जहां संताप है।
समझूँ तो जोड़ूंगी कुछ और पंक्तियाँ फिर से।
कि प्रेम ही है या प्रेम सा कुछ और है …

Blue Wave

From me to you. From you to me. This is our world. This freedom... in limit! This is it! You see me. I see you. This is our vision. Blurred...yet definite! This is it! Your words reach me. My words reach you.  This is our domain. This conversation on repeat! This is it! And so the blue wave, as it starts from you to me and goes back from me to you,  is blue… intact.  No adulteration! Only some greys of miscommunication. And some greens of emotion. We know, the door is open. We know, our world can be bigger. We can run out, may be together. But our bodies are tangled. And so are our souls. In this ambit! We chose this defeat. This is it!